जतिन दास: 63 दिनों की भूख हड़ताल, देश की आजादी के लिए जेल में दे दी जान

जतिन दास: 63 दिनों की भूख हड़ताल, देश की आजादी के लिए जेल में दे दी जान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर किया। जतिन दास भी उन्हीं वीरों में शामिल थे, जिन्होंने अंग्रेजों की जेल में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष किया। लाहौर जेल में 63 दिनों तक भूख हड़ताल करने के बाद 13 सितंबर 1929 को उनका निधन हो गया। उनका बलिदान ब्रिटिश शासन की जेल व्यवस्था और भारतीय कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ देशव्यापी विरोध का प्रतीक बन गया।

कौन थे जतिन दास?

जतिन दास का पूरा नाम जतिंद्रनाथ दास था। उनका जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही उनमें देश के प्रति लगाव और अंग्रेजी शासन से मुक्ति की भावना थी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने भी उन्हें प्रभावित किया। आगे चलकर वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए और स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

जतिन दास बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े थे। बाद में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के लिए भी काम किया। इस संगठन से भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी जुड़े हुए थे। जतिन दास को रसायन विज्ञान और विस्फोटक बनाने की तकनीक का ज्ञान था, जिसका इस्तेमाल क्रांतिकारी गतिविधियों में किया गया।

जेल में भारतीय कैदियों के साथ होता था भेदभाव

1929 में लाहौर षड्यंत्र मामले के सिलसिले में जतिन दास को गिरफ्तार कर लाहौर जेल में रखा गया। वहां उन्होंने भारतीय कैदियों की खराब हालत को करीब से देखा। भारतीय बंदियों को खराब खाना, गंदे कपड़े और अस्वच्छ वातावरण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इसके अलावा, उन्हें किताबें और अखबार पढ़ने जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त रूप से नहीं मिलती थीं। क्रांतिकारियों का कहना था कि राजनीतिक मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों के साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं होना चाहिए। वे बेहतर भोजन, साफ कपड़े, स्वच्छ रहने की जगह और पढ़ने-लिखने की सुविधाएं चाहते थे। जब उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो जेल के भीतर विरोध शुरू हुआ। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त समेत कई क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया।

13 जुलाई 1929 से शुरू हुई ऐतिहासिक भूख हड़ताल

जतिन दास 13 जुलाई 1929 को भूख हड़ताल में शामिल हुए। उनका उद्देश्य जेल प्रशासन पर दबाव बनाना था, ताकि राजनीतिक बंदियों के साथ सम्मानजनक और समान व्यवहार किया जाए। दिन बीतने के साथ उनकी सेहत बिगड़ती चली गई। जेल प्रशासन ने भूख हड़ताल खत्म कराने के लिए जबरन भोजन कराने की कोशिशें भी कीं। इसके बावजूद जतिन दास अपनी मांगों से पीछे नहीं हटे। उनकी हालत गंभीर होने लगी, लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा। यह भूख हड़ताल केवल जेल की सुविधाओं का मामला नहीं रह गई थी। इसने ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों और भारतीय कैदियों के साथ होने वाले व्यवहार को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।

63 दिनों तक संघर्ष, फिर देश के लिए शहादत

13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में जतिन दास का निधन हो गया। उनकी उम्र उस समय केवल 24 वर्ष थी। लगातार 63 दिनों तक भूख हड़ताल करने के कारण उनका शरीर बेहद कमजोर हो चुका था। उनकी मृत्यु की खबर फैलते ही देशभर में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया। राजनीतिक बंदियों के अधिकारों की मांग को व्यापक समर्थन मिलने लगा। जतिन दास ने अपने संघर्ष के जरिए यह सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति को जेल में रखने का मतलब क्या उसके बुनियादी अधिकार और मानवीय सम्मान छीन लेना भी है? उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन को भावनात्मक और राजनीतिक स्तर पर गहरा प्रभावित किया।

अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

जतिन दास के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया। रास्ते में कई रेलवे स्टेशनों पर लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। कलकत्ता में भी उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। इस यात्रा में सुभाष चंद्र बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जतिन दास के अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ ने दिखाया कि उनका बलिदान केवल क्रांतिकारी संगठनों तक सीमित नहीं था, बल्कि आम जनता के दिलों को भी छू चुका था। उनकी शहादत ने ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान को और मजबूत किया।

जतिन दास की शहादत पर विधानसभा में भी उठा सवाल

जतिन दास की मौत के बाद राजनीतिक बंदियों के साथ होने वाले व्यवहार का मुद्दा केंद्रीय विधायी सभा में भी उठा। मोतीलाल नेहरू ने जेल में क्रांतिकारियों की स्थिति को लेकर निंदा प्रस्ताव पेश किया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यह प्रस्ताव 55 के मुकाबले 47 मतों से पारित हुआ। इस घटनाक्रम ने जेलों की परिस्थितियों और राजनीतिक बंदियों के अधिकारों पर बहस को और तेज किया। हालांकि, क्रांतिकारियों की सभी मांगें तत्काल स्वीकार नहीं की गईं, लेकिन उनकी भूख हड़ताल ने जेल सुधार और मानवीय व्यवहार के सवाल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई।

भगत सिंह के साथी ही नहीं, अपने आप में एक महान क्रांतिकारी

जतिन दास को अक्सर भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों के साथ याद किया जाता है, लेकिन उनका योगदान स्वतंत्र पहचान रखता है। उन्होंने जेल के भीतर अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ ऐसा संघर्ष किया, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी। उनकी लड़ाई इस विचार पर आधारित थी कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजों को देश से बाहर करना नहीं, बल्कि अन्याय और भेदभाव के खिलाफ खड़ा होना भी है। उनका बलिदान राजनीतिक बंदियों के अधिकारों और मानवीय गरिमा की रक्षा के संघर्ष का अहम अध्याय है।

आज भी प्रासंगिक है जतिन दास का संदेश

जतिन दास की कहानी आज भी याद दिलाती है कि किसी भी परिस्थिति में इंसान की गरिमा और बुनियादी अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। जेल में बंद व्यक्ति भी सम्मानजनक व्यवहार, स्वच्छ वातावरण और जरूरी सुविधाओं का हकदार है। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए जिस दृढ़ता से संघर्ष किया, वह आज की पीढ़ी को भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देता है। जतिन दास का जीवन छोटा था, लेकिन उनका बलिदान भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ गया। 63 दिनों की भूख हड़ताल ने उन्हें उस क्रांतिकारी के रूप में स्थापित किया, जिसने राजनीतिक बंदियों के सम्मान और अधिकारों के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए।


न्यूज़ डेस्क