ईरान वॉर का पर्यावरणी तबाही: 14 दिनों में साल भर का प्रदूषण! अगर युद्ध 1 साल चला तो क्या होगा?
ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध के महज 14 दिनों (28 फरवरी से 14 मार्च 2026) में इतना कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित हो चुका है, जितना किसी मध्यम आकार के देश जैसे कुवैत पूरे साल में निकालता है।
लखनऊ/नई दिल्ली, 28 मार्च 2026: ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध के महज 14 दिनों (28 फरवरी से 14 मार्च 2026) में इतना कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित हो चुका है, जितना किसी मध्यम आकार के देश जैसे कुवैत पूरे साल में निकालता है। Climate and Community Institute की नई रिसर्च के मुताबिक, इस दौरान 50.55 लाख टन CO₂e (कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष) निकला – जो आइसलैंड के पूरे साल के उत्सर्जन से भी ज्यादा है।
अगर युद्ध इसी रफ्तार से 1 साल तक चला तो कुल उत्सर्जन 13 करोड़ 14 लाख टन CO₂e के आसपास पहुंच जाएगा! यह आंकड़ा 84 सबसे कम प्रदूषण फैलाने वाले देशों के पूरे साल के संयुक्त उत्सर्जन के बराबर है।
कहां से निकला इतना प्रदूषण?
रिसर्च बताती है कि सबसे बड़ा हिस्सा घरों, स्कूलों और इमारतों के ध्वस्त होने से आया – करीब 24 लाख टन CO₂e। इसके बाद तेल भंडारण, रिफाइनरी और टैंकरों पर हमले से 19 लाख टन। जेट, जहाज, मिसाइल और ड्रोन के ईंधन से 5 लाख टन।
तेहरान और आसपास के इलाकों में तेल के आग के धुएं ने "ब्लैक रेन" (काला बारिश) की स्थिति पैदा कर दी। लोग मास्क लगाकर सड़कों पर घूम रहे हैं, हवा में जहरीली गैसें भरी हैं।
1 साल चला तो क्या होगा?
- जलवायु संकट तेज: इतना CO₂ ग्लोबल वार्मिंग को और बढ़ाएगा। समुद्र स्तर बढ़ना, मौसम चरम, सूखा-बाढ़ बढ़ेगा।
- स्वास्थ्य खतरा: काला धुआं, सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर से सांस की बीमारियां, कैंसर का खतरा।
- तेल संकट: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से दुनिया की 20% तेल सप्लाई प्रभावित – भारत जैसे आयातक देशों पर महंगा असर।
- लंबे समय का नुकसान: रिफाइनरी जलने से मिट्टी-नदी-समुद्र में प्रदूषण दशकों तक रहेगा।

